मुंबई का इतिहास – बॉम्बे से मुंबई बनने तक की रोचक कहानी

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सपनों की नगरी मुंबई – जहां हर भारतीय का सपना सच होता है

मुंबई भारत का वह मेट्रो सिटी है जहां हर भारतीय के सपने सच होते हैं। पहले इसे बॉम्बे कहा जाता था, और बॉम्बे से मुंबई बनने तक का सफर बेहद दिलचस्प इतिहास समेटे हुए है। एक समय ऐसा भी था जब यह शहर दहेज में एक विदेशी राजा को दे दिया गया था।

सपनों की नगरी कहे जाने वाले इस शहर ने सदियों से कई बदलाव देखे आज आपको मुंबई का जो चेहरा देखने को मिलता है यह हमेशा से वैसा नहीं था बल्कि यह तो सात आइलैंड में बटा हुआ आर्किपेलागो था जिसे आर्किपेलागो ऑफ सेवन आइलैंड्स के नाम से जाना जाता था आखिर कैसे ये आइलैंड्स मिलकर एक शहर बने किसने इस पोर्ट टाउन को बसाया और आखिर बॉम्बे मुंबई कैसे बना सिविलाइजेशन की बात करें तो इंजीनियस ट्राइब स्टोन एज से ही इन सभी आइलैंड्स पर रहा करते थे कोलिस एंड आगरी नाम के ट्राइब्स यहां के के सबसे अर्लीस्ट नोन सेटलर्स थे दरअसल सदियों पहले बॉम्बे शहर था ही नहीं बल्कि यह जगह कई आइलैंड्स में बटा हुआ था इस जगह पर बॉम्बे कोलाबा लिटिल कोलाबा मजगांव परेल वर्ली और माहिम नाम के सात अलग-अलग आइलैंड्स हुआ करते थे ये आइलैंड्स कुछ दूरी पर एक दूसरे से अलग-अलग बसे हुए थे उन दिनों यहां केवल फिशिंग विलेजेस मार्शेज मट फ्लैट्स केव्स टेंपल्स एंड हिल्स ही देखने को मिलते थे

सात द्वीपों वाला शहर – मुंबई की शुरुआती पहचान

इन आइलैंड्स में रहने वाले ज्यादातर लोग मछुआरे थे जो यहां मछली पकड़कर अपना जीवन चलाते थे इसके अलावा भी कई कम्युनिटीज इन आइलैंड्स में रहती थी सबसे मजेदार बात यह है कि सातों आइलैंड्स अलग-अलग कल्चर को फॉलो किया करते थे और इन सबके इंडिजिनियस किंग्स हुआ करते थे थर्ड सेंचुरी बीसीई से लेकर 1348 तक यहां पर अलग-अलग हिंदू डायनेस्टीज ने राज किया सबसे पहले यहां मोरियन किंग अशोका का राज हुआ करता था लेकिन 185 बीसीई में मौर्य एंपायर के डिक्लाइन के साथ सेकंड सेंचुरी बीसीई से लेकर 10th सेंचुरी सीई तक इन आइलैंड्स पर वेरियस इंजीनियस डायनेस्टीज ने राज किया जिसमें सत्व हनस अभिरा वाक टकस कालाचूरिस कनकन चालुक्यास राष्ट्र कटास सिहार अस और छोला शामिल थे 1348 में दिल्ली सल्तनत ने इन सभी आइलैंड्स पर कब्जा कर लिया और यहीं से हिंदू रूलरसोंग्स [संगीत] का कंट्रोल रहा और इसी दौरान नजरुदीन मोहम्मद बिन तुगलक जो कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान थे उन्होंने जाफर खान को गुजरात का गवर्नर बना दिया था

जल्दी ही 1398 में जब तुगलक डायनेस्टी कमजोर हो गई तब जाफर खान ने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी गुजरात सल्तनत की नीव डाल दी इसी पावर शिफ्ट के साथ बम्बे भी अब गुजरात सल्तनत का हिस्सा बन गया वैसे तो कहने को पोर्तुगीज 1509 में ही बम्बे पहुंच गए थे

पुर्तगालियों का आगमन और बॉम्बे पर कब्जा,बॉम्बे का ब्रिटिशों को दहेज में जाना

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लेकिन इन्हें बम्बे को पूरी तरह हासिल करने में दो दशक तक का समय और लगा 1534 में बम्बे पूरी तरह से पोर्तुगीज के कब्जे में आ गया हालांकि पोर्तुगीज ने बम्बे पर ज्यादातर एग्रीकल्चरल एंड रिलीजस डेवलपमेंट्स ही किए तब भी इन्होंने शहर के चारों ओर रोड कॉसवेज एंड कई फोर्ट्स का निर्माण किया जिसमें बॉम्बे कैसल बनरा फोर्ट एंड मद फोर्ट जैसे कई किले भी शामिल है जिससे इन आइलैंड्स में कम्यूटर काफी इजी हो गया पोर्तुगीज ने लगभग एक सेंचुरी तक यहां राज किया और आखिरकार एक मैरिज ट्रीटी में पोर्तुगीज किंग जॉन फोर ने अपनी बेटी की शादी करते वक्त यह आइलैंड्स ब्रिटिश किंग चार्ल्स 2 को दहेज में दे दिया 20 में 1498 में पोर्तुगीज एक्सप्लोरर वास्को ड गामा सबसे पहले यूरोपियन ट्रेडर के रूप में इंडिया के मालाबार कोस्ट कालीकट पहुंचे अपने अराइवल के कई साल बाद 1505 में पोर्तुगीज के फर्स्ट वाइस रॉय फ्रांसिस्को डे एल मडा ने कोचन में अपना पहला हेड क्वार्टर एस्टेब्लिश किया और 1510 में बीजापुर सल्तनत को हराकर गोवा को कैप्चर कर उसे अपना परमानेंट सेटलमेंट बना लिया पोर्तुगीज का भारत में आना इन सभी आइलैंड्स को पूरी तरह से बदल कर रखने वाला था

सबसे पहले दिसंबर 1508 में पोर्तुगीज वायसरॉय फ्रांसिस्को डे अल मडा कन्ना नोर से दियो तक के अपने अभियान के दौरान बॉम्बे पहुंचते हैं इन्होंने अपने शिप को बॉम्बे आइलैंड के किनारे लगाया बॉम्बे कर अरेबियन सी से लगे होने की वजह से अलमीरा को यह जगह काफी पसंद आई अलमेडा इन पोर्ट्स को देखकर इतने खुश हुए कि इन्होंने इस पोर्ट का नाम बम बाहिया दिया जिसका मतलब था गुड बे बाद में यह सभी आइलैंड्स बम बाहिया के नाम से पॉपुलर होने लगे

जब 1661 में ब्रिटिश क्राउन ने इन सभी आइलैंड्स पर अपना कब्जा जमाया तब इसका नाम बदलकर बॉम्बे कर दिया धीरे-धीरे इन सारे आइलैंड्स को बॉम्बे नाम से बुलाया जाने लगा हालांकि अल्मेदा ने यहां 1508 में ही विजिट कर लिया था लेकिन पोर्तुगीज को बॉम्बे तक आने में एक साल का समय लग गया दरअसल बॉम्बे आइलैंड्स उन दिनों सुल्तान बहादुर शाह जो कि गुजरात सल्तनत के किंग थे उनके अंडर आता था इसलिए पोर्तुगीज यहां सीधे तौर पर नहीं आ सके हालांकि पोर्तुगीज लगातार गुजरात सल्तनत के साथ कॉन्फ्लेट्स में थे इसी दौरान पुर्तगालियों ने माहिम क्रीक पर अपनी जीत हासिल कर ली और 21 जनवरी 1509 को गुजरात सल्तनत के एक जहाज पर कब्जा करने के बाद अपनी पहली यात्रा बॉम्बे आइलैंड के लिए की लेकिन इससे उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली क्योंकि बहादुर शाह ने इन आइलैंड्स को फिर से रीकैप्चर कर लिया था लगातार हो रहे फ्लिक्स के बावजूद पोर्तुगीज ने 1526 में वसाइन जिसे अब वसई के नाम से जाना जाता है

वहां अपनी पहली फैक्ट्री खोली इन दिनों बहादुर शाह ने इन आइलैंड्स में इस्लाम को काफी प्रचलित किया था लेकिन वह लगातार मुगल मराठा वर्ड्स में फंसे रहते थे जिसकी वजह से उनका इन्फ्लुएंस इन आइलैंड्स में काफी कम हो गया था पोर्तुगीज इस मौके की तलाश में काफी दिनों से थे और अब उन्हें यह मौका मिलने ही वाला था 1528 से 1529 के दौरान पोर्तुगीज गवर्नर लोपो वास डे सपाइयों ने गुजरात सल्तनत से फोर्ट ऑफ माहिम को छीन लिया इस वक्त तक मुगल एंपरर हुमायूं भी मुगल एंपायर को बढ़ाने में जुटा हुआ था गद्दी संभालते ही उसने अपना रुख बिहार और गुजरात की तरफ कर लिया बहादुर शाह को एहसास होने लगा था कि जल्द ही हुमायूं अब गुजरात को उससे छीन लेगा दिन बदन बहादुर शाह का यह बढ़ता हुआ डर उन्हें पोर्तुगीज से दोस्ती करने पर मजबूर करने लगा लेकिन पोर्तुगीज के एंबिशन कुछ और ही थे एक साइड जहां बहादुर शाह की हुमायूं से इनसिक्योरिटीज बढ़ती ही जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर पोर्तुगीज ने बहादुर शाह के इस डर का फायदा उठाया पोर्तुगीज ने हुमायूं के अटैक से गुजरात सल्तनत को बचाने और उनका साथ देने के बदले 23 दिसंबर 1534 को बहादुर शाह के साथ ट्रीटी ऑफ [संगीत] बसाइनी को सौंप दिया और इसी के साथ बॉम्बे एंड बसीन पर से गुजरात सल्तनत का एंड हो गया बॉम्बे पर कब्जा करने के बाद पुर्तगालियों के हाथों में बॉम्बे के सातों आइलैंड्स थे अब

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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण

लेकिन जल्दी ही यहां इंग्लिश मर्चेंट ने नवंबर 1583 में एंट्री की जिसके साथ ही ब्रिटिशर्स और पोर्तुगीज में भारत के डिफरेंट एरियाज पर वर्चस्व को लेकर लड़ाई छिड़ गई दूसरी कई यूरोपियन पावर्स इंडिया में पोर्तुगीज के स्पाइस ट्रेड मोनोपोली को खत्म करना चाहते थे इसीलिए वह लगातार भारत में मुगल एंपरर से बिजनेस करने की मंजूरी मांग रहे थे वहीं दूसरी ओर पोर्तुगीज मुगल किंग को काफी ज्यादा टैक्स देते थे जिसकी वजह से यह राजा दूसरे यूरोपियन ट्रेडर्स को कोई मौका नहीं दे रहे थे इसी दौरान 1612 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत के स्वाली में अपने शिप्स को लगाया और यहां के गवर्नर से ट्रेड करने की मंजूरी मांगी लेकिन बदले में उनके दो ट्रेडर्स को गिरफ्तार कर लिया गया जिसके के बाद पोर्तुगीज और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच में यहां एक बैटल हुई जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी जीत गई इस बैटल को बैटल ऑफ स्वाली कहा जाता है जिसमें पहली बार पोर्तुगीज को किसी दूसरी यूरोपियन कंपनी ने हराया था इस जीत के बाद पोर्तुगीज की इंडिया में ना सिर्फ ट्रेड मोनोपोली खत्म हुई बल्कि उनकी क्रेडिबिलिटी भी खराब हो गई इसके साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी को इंडिया के कुछ एरियाज में ट्रेड की परमिशन भी मिल गई एक तरफ ब्रिटिशर्स अपने ट्रेड को भारत में एक अच्छे लेवल पर ले जाने के लिए जी जान लगा रहे थे तो दूसरी ओर मिडिल ऑफ द 177th सेंचुरी तक भारत में डच की पावर काफी ज्यादा बढ़ती नजर आ रही थी धीरे-धीरे अब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने पांव फैलाने लगी इधर पोर्तुगीज का वर्चस्व भी भारत से कम होता जा रहा था ब्रिटिशर्स इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते थे कि अगर उन्हें भारत में ट्रेड करना है तो जल्दी ही उन्हें सारे कोस्टल एरियाज में अपना कंट्रोल एस्टेब्लिश करना होगा हालांकि उन दिनों ईस्ट इंडिया कंपनी अपना ट्रेड मेनली पटना सूरत कोलकाता और गुजरात में ही कर रही थी लेकिन दूसरी कंट्रीज को भारत में आने से रोकने के लिए उन्हें वेस्टर्न कोस्ट को भी सुरक्षित करना था बॉम्बे आइलैंड्स भी इंडिया के वेस्टर्न कोस्ट में ही था जहां अरेबियन सी के रास्ते थे दूसरे कंट्रीज के ट्रेडर भारत की तरफ आ सकते थे ईस्ट इंडिया कंपनी किसी भी हाल में किसी और को भारत पर अपना राज जमाने नहीं देना चाहती थी

जिस कारण ईस्ट इंडिया कंपनी के सुझाव पर ब्रिटिश एंपायर की सूरत काउंसिल ने बॉम्बे को पोर्गी के जॉन फोर्स एक्वायर करने के बारे में सोचा इस सोच को हकीकत में लाने के लिए ब्रिटिशर्स ने पोर्तुगीज के सामने मैरिज का प्रपोजल पेश किया जिसमें ब्रिटिश किंग चार्ल्स सेकंड ऑफ इंग्लैंड और पोर्तुगीज प्रिंसेस कैथरीन ऑफ ब्रागांजा जो कि पोर्तुगीज किंग जॉन 4 की बेटी थी उनकी शादी का प्रपोजल दिया गया यह शादी कम और स्ट्रेटेजिक एलायंस ट्रीटी ज्यादा लगती थी जिसके प्रपोजल में शर्तों की एक लिस्ट थी इन्हीं शर्तों में से एक शर्त यह थी कि पोर्तुगीज को बॉम्बे के सातों लेंटस को शादी में गिफ्ट के तौर पर इंग्लैंड को देना होगा शादी का यह प्रपोजल 1661 में ही ब्रिटिशर्स ने पोर्तुगीज को दे दिया था लेकिन पोर्तुगीज के कई मिनिस्टर्स इस बात के खिलाफ थे इसके अलावा प्रिंसेस भी इस शादी को मानने से इंकार करती रही क्योंकि उन्हें किंग ऑफ इंग्लैंड के कई रिश्तों से ऐतराज था लेकिन डचेस का बढ़ता इन्फ्लुएंस अब पोर्तुगीज को डराने लगा था 16th सेंचुरी के अंत में डचेस इंडियन ओशन में पोर्तुगीज की मोनोपोली को चैलेंज करने लगे उन्होंने वो बिजनेस जिस पर पोर्तुगीज का एकाधिकार था वह उनसे छीनने लगे अब डचेस भारत के अलावा दूसरे ईस्टर्न देशों में भी घुसने लगे और मसाले सिल्क और गोल्ड का बिजनेस करने लगे देखते ही देखते उन्होंने पोर्तुगीज के बिजनेस को तेजी के साथ छीनना शुरू कर दिया 177th सेंचुरी के एंड तक तो नीदरलैंड्स यूरोप का सबसे धनी देश बन गया डचेस के इस बढ़ते कॉलोनाइजेशन को देखकर पोर्च गीज अब डर गए उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने में अपना फायदा दिखने लगा उन्होंने सोचा कि अगर ब्रिटिश क्राउन से संबंध अच्छे हो जाए तो डचेस को भारत में आने से रोका जा सकता है इसी बात को मद्देनजर रखते हुए वो भी मैरिज ट्रीटी पर अग्री हो गए फिर 1668 में ये शादी हुई और शादी के बाद 27th मार्च 1668 को बॉम्बे आइलैंड्स पर इंग्लैंड का राज हो गया अब पोर्तुगीज के लिए ऐसा करना कोई बड़ी चीज नहीं थी उन्होंने बॉम्बे का वो उभरता भविष्य नहीं देखा था

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ईस्ट इंडिया कंपनी बॉम्बे के जरिए आराम से अपने गुड्स को इंपोर्ट एंड एक्सपोर्ट कर सकते थे और आने वाले समय में वह अपने ट्रेडिंग सेंटर को गुजरात के सूरत से बॉम्बे शिफ्ट करने वाले थे इस आइलैंड की इंपॉर्टेंस को समझते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी हर हाल में इसे हथियाना चाहती थी जिस कारण कंपनी ने किंग से आइलैंड की मांग की और किंग ने 27th मार्च 1668 को केवल 10 पाउंड एनुअल रेंट के तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को यह आइलैंड लीस पर दे दिया ईस्ट इंडिया कंपनी ने बॉम्बे को अपने हाथ में लेते ही इसके रंग डंग बदलने शुरू कर दिए सबसे पहले कंपनी ने यहां की डेवलपमेंट पर ध्यान देते हुए कई चेंजेज करने शुरू किए ब्रिटिशर्स ने यहां कई क्वे वेयर हाउसेस और कस्टम हाउसेस बनवाए इसके अलावा ब्रिटिशर्स ने बॉम्बे कासल के आसपास फोर्टिफिकेशंस भी करवाए और एक सिविल कोट भी बनवाया बॉम्बे का पहला गवर्नर इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रेसिडेंट जॉर्ज ऑक्सिन को बनाया गया डेवलपमेंट और एडमिनिस्ट्रेशन के काम के साथ कंपनी ने यहां अपने बिजनेस को भी तेजी से स्प्रेड करना शुरू कर दिया लेकिन बॉम्बे में बिजनेस को बढ़ाने के लिए पहले इस जगह को फर्द डेवलप करने की जरूरत थी उस समय नायलैंड पर हेल्थ फैसिलिटी ना के बराबर थी और इसी वजह से यहां काफी बीमारियां फैलती रहती थी जिस कारण लोगों का यहां काम करना काफी मुश्किल था इस प्रॉब्लम को टैकल करने के लिए ब्रिटिशर्स ने यहां कई हॉस्पिटल्स और मेडिकल ट्रीटमेंट की फैसिलिटी अ अवेलेबल करवाई मेडिकल फैसिलिटी के चलते बॉम्बे की पॉपुलेशन में काफी सुधार देखा गया 1661 से 1675 के बीच बॉम्बे की पॉपुलेशन में बढ़ोतर

आधुनिक मुंबई की शुरुआत

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यहां से बॉम्बे को एक मॉडर्न बॉम्बे बनाने का दौर शुरू हो गया 1782 में विलियम हनबी बॉम्बे के गवर्नर बनते हैं उन दिनों बॉम्बे सात अलग-अलग आइलैंड्स में बटा हुआ था जो कि कई कारणों से विलियम नबी को बॉदर करने लगा था इसी वजह से उन्होंने एक ऐसे प्रोजेक्ट को शुरू किया जो कि अब बॉम्बे को हमेशा के लिए बदलने वाला था दरअसल इन सभी आइलैंड्स पर आने जाने के लिए ब्रिटिश ट्रेडर्स को बोट और शिप का सहारा लेना पड़ता था ऐसी हालत में जब भी बाढ़ या सुनामी आती थी तो ये सारे बोट्स बर्बाद हो जाते थे जिससे कि ईस्ट इंडिया कंपनी को काफी नुकसान का सामना करना पड़ता था इसके अलावा सूरत पोर्ट मुगल साम्राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक था तो ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगलो से हमेशा ही डर लगा रहता था उन्हें अब एक नए बंदरगाह की जरूरत भी थी जहां वह मुगल किंग्स की नजरों से दूर खुद को फ्लोरिश कर सके इसके अलावा सातों आइलैंड्स की एडमिनिस्ट्रेशन को संभालने में भी ईस्ट इंडिया कंपनी को दिक्कतें आ रही थी इन्हीं सारी परेशानियों को दूर करने के लिए विलियम हनबी ने इन सातों आइलैंड्स को जोड़ने के लिए वेला रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट शुरू किया इन्हें पता था कि जब यह सातों आइलैंड्स आपस में जुड़ जाएंगे तब यहां ट्रेड डेवलपमेंट और एडमिनिस्ट्रेशन को मैनेज करना आसान हो जाएगा इस सपने को हकीकत करने के लिए उन्होंने इन सातों आइलैंड्स के बीच कॉसवेज बनाने लगे जिसे ऑफिशियल हनबी वेलर्ड रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट का नाम दिया गया इस प्रोजेक्ट का मकसद था कि सातों आइलैंड्स के बीच की दूरी को मलबों से भरकर जोड़ दिया जाए सातों आइलैंड्स को जोड़ने का यह प्रोजेक्ट 1782 में शुरू हुआ और 1845 में आकर खत्म हुआ इस तरह हमें वो बॉम्बे शहर मिला जिसे आप आज मुंबई के नाम से जानते हैं

अब जब सातों आइलैंड्स को जोड़ दिया गया तो ब्रिटिशर्स ने भारत को लूटने के लिए एक अलग से पोर्ट विकसित कर लिया कॉसवेज बनने के साथ ही बॉम्बे में अब फैक्ट्रीज लगने लगी इन फैक्ट्रीज में ब्रिटिशर्स भारत के कच्चे माल को स्टोर किया करते थे और सीधे यहीं से सारा सामान इंग्लैंड भेज दिया जाता था इसी तरह इंग्लैंड से आए फिनिश गुड्स को यहीं से पूरे देश में बेचने के लिए ले जाया जाता था यहां फैक्ट्रीज बनाने के लिए ब्रिटिशर्स को चीप लेबर की जरूरत थी इसलिए उन्होंने बाहरी राज्यों से लोगों को लाना और यहां बसाना शुरू कर दिया देखते ही देखते ये शहर अब अब कोलकाता की बराबरी करने लगा था और कुछ समय में ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया का भी फाइनेंशियल कैपिटल भी बनने वाला था लेकिन अब भी यहां सड़कों की कमी थी जिसकी वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने ट्रेड को और अच्छी तरह से ऑपरेट करने के लिए यहां कई सड़कें बनवाई देश के कोने-कोने से कच्चे माल मेटल्स मसालों और सिल्क को तेजी के साथ पहुंचाने के लिए 1845 आते-आते ब्रिटिश ने इंडिया में रेलवे सर्विसेस भी शुरू कर दी थी क्योंकि बम्बे ब्रिटिश इंडिया के फाइनेंशियल हब के रूप में उभर गया था तो यहां एलीट क्लास के ऑफिसर्स और लोग भी रहा करते थे इन्हीं लोगों को फैसिलिटेट करने के लिए ब्रिटिशर्स ने भारत में पहली बार पैसेंजर ट्रेन भी बॉम्बे में ही चलाई थी 18533 बंदर से थाने के बीच चलाई गई इसी बीच भारत में एक बड़ा बदलाव हुआ भारत में 1857 की क्रांति ने जोर पकड़ ली इस क्रांति के बाद ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से डिजॉल्वेशन ट्रेडिंग की बागडोर अब भी ईस्ट इंडिया कंपनी के पास थी 1 जून 187 4 को एक्ट ऑफ पार्लियामेंट के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी को पूरी तरह से [संगीत] डिजॉल्ड्रिंग के अंडर आ गया और बॉम्बे सहित पूरे भारत की अफेयर्स की बागडोर अब ब्रिटिश राज के हाथों में चली गई क्योंकि बॉम्बे भारत के सबसे उन्नत और बड़े शहरों में से एक था इसलिए ब्रिटिश क्राउन ने इसे फर्द डेवलप करने के कई प्लांस पर काम किए टाइम के साथ बॉम्बे काफी प्रॉस्परस होता चला गया जैसे ही यहां फैक्ट्री सेटअप हुई और अर्बनाइजेशन शुरू हुआ अर्बनाइजेशन शुरू होने के साथ ही यहां की पॉपुलेशन बढ़ने लगी बाहर से लोग और कामगार यहां नई अपॉर्चुनिटी की तलाश में आने लगे बढ़ती पॉपुलेशन की वजह से यहां अब कई परेशानियां भी शुरू होने लगी जिसमें मेजर प्रॉब्लम हेल्थ केयर सिस्टम का था 18960 के हालात काफी नाजुक हो गए इसके बाद यहां ब्रिटिश एंपायर ने बॉम्बे सिटी इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को बनाया जिससे कि बम्बे की हालत को सुधारा जा सकता था इसके बाद इस ट्रस्ट ने यहां नए सेटलमेंट बनाए जहां लोगों को सेटल किया गया इस नए सेटलमेंट के दौरान ब्रिटिशर्स ने भारतीय कामगारों और आर्टिजंस को यहां से निकाल दिया जिससे कि ब्रिटिशर्स को अपने फायदे के लिए और ज्यादा जमीनें मिल गई और जो भारतीय आर्टिजंस यहां रहा करते थे रातों-रात बेघर हो गए इसी ग्रुप ने बॉम्बे के चारों तरफ सी वॉल्स बनाने का काम शुरू किया हालांकि यह प्रोजेक्ट काफी एंबिशियस था और इसी वजह से इसका काम काफी लंबा चला वर्ल्ड वॉर ट के समय जब फाइनली मरीन ड्राइव का निर्माण हुआ तब जाके यह सीवॉल का प्रोजेक्ट पूरा हो सका हालांकि बॉम्बे में डेवलपमेंट तेज रफ्तार में हुई लेकिन इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ ब्रिटिश एंपायर के इनकम को बढ़ाने और भारत से ज्यादा से ज्यादा धन लूट कर ले जाने का था बॉम्बे में मरीन ड्राइव फ्लाई ओवर का निर्माण भी वर्ल्ड वॉर ट में सिपाहियों को खाना पानी जरूरत के सामान और युद्ध के हथियारों को आसानी से और तेजी के साथ ट्रांसपोर्ट करने के लिए हुआ था 1945 में जब मरीन ड्राइव का काम पूरा हुआ तब बॉम्बे के सबर्स में भी काफी खाली जमीन मिली जहां डेवलपमेंट्स और रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी बिल्ड अप होने लगी ब्रिटिश राज के टाइम में बॉम्बे पॉलिटिक्स और बिजनेस का बड़ा हब बन गया ब्रिटिशर्स ने यहां कई बड़े स्ट्रक्चर्स बनवाए जो आज तक भारत की शान में खड़े हैं द राजा बाइ क्लॉक टावर विक्टोरिया टर्मिनस और बॉम्बे हाई कोर्ट का निर्माण भी ब्रिटिश रूल के दौरान ही हुआ था 1911 में जब जॉर्ज 5थ का भारत के एंपरर के तौर पर कोरोनेशन होने वाला था तब मुंबई के आइकॉनिक गेटवे ऑफ इंडिया का निर्माण किया गया जो कि 1924 में बनकर पूरा हुआ 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब तक बॉम्बे भारत के सबसे इंपॉर्टेंट शहरों में शुमार हो गया था यहां गुजराती समाज के लोगों का काफी बोलबाला था पोस्ट इंडिपेंडेंस यहां के इकोनॉमी और बिजनेस गुजराती समाज के लोगों के हाथ में था जिसकी वजह से मराठी स्पीकिंग पॉपुलेशन में काफी डिसेटिस्फेक्शन फैलता जा रहा था जिसकी वजह से यहां 1956 से 1960 तक मराठा प्रोटेस्ट चला इस दौरान बॉम्बे में काफी वायलेंस फैलने लगा बढ़ती अनसेटिस्फेक्शन और वायलेंस की वजह से 1960 में बॉम्बे स्टेट का पार्टीशन कर दिया गया और इसके बाद दो नए स्टेट्स महाराष्ट्र और गुजरात को फॉर्म किया गया इसके बाद बॉम्बे प्रेसिडेंसी का अर्बन एरिया बॉम्बे के नाम से जाना गया और महाराष्ट्र का कैपिटल सिटी बन गया 1995 में बम्बे का नाम बदलकर इसका मराठी नाम मुंबई कर दिया गया

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