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व्हाइट हाउस से निकलते ही यूएस का प्रेसिडेंट दुनिया का मोस्ट गार्डेड इंसान बन जाताजो बगल में आप बैग देखते हो उसको न्यूक्लियर फुटबॉल इसलिए बोलते हैं। अपनी टॉयलेट सीट ये लोग खुद लेके आते हैं और प्रेसिडेंट के यूरिन और स्टूल को सील करके कंटेनर में वापस यूएस ले जाते हैं। माइक्रोबायोलॉजिकल फूड टेस्टिंग लैब बनाई जाती है होटल में प्रेसिडेंट के खाने के लिए। बंदरों को भगाने के लिए लंगूर रेंट पे लाए गए और आदमियों से लंगूर की आवाज निकलवाई। [संगीत] लिस्टिंग डिवाइस की वजह से प्रेसिडेंट के रूम की टीवी यूनिट तक चेंज की जाती है और बुलेट प्रूफ ग्लास लगाए जाते हैं। यूएस के एजेंट डमी टिकट और फेक पासपोर्ट देके जानबूझ के एयरपोर्ट में घुसाते हैं। प्रेसिडेंट की कार में उनके ब्लड ग्रुप का इमरजेंसी ब्लड पहले से ही स्टोर होता है। G20 में भी इंडिया के मिनिस्टर्स को बस में बैठा के ले गए थे कार की जगह

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देखने में तो यह बहुत ही सिंपल सा इवेंट लगता है। लेकिन एक्चुअल में उस टाइम पे दुनिया का सबसे महंगा और हैवली गार्डेड शो चल रहा होता है। जिसके हर मूव की मिनट बाय मिनट प्लानिंग यूएस के एजेंट्स ने पहले से लिखी होती है। ओलंपिक्स जहां लाखों लोगों को मैनेज करने के लिए जिस लेवल की सिक्योरिटी और कोऑर्डिनेशन की जरूरत होती है, उससे कहीं ज्यादा कॉम्प्लेक्स प्लानिंग एक अकेले इंसान यूएस प्रेसिडेंट की 15 मिनट की सिटी वॉक में लग जाती है। वाइट हाउस से बाहर निकलते ही यूएस प्रेसिडेंट इस प्लेनेट का सबसे हैवली गार्डेड इंसान बन जाता है। और जब यूएस का प्रेसिडेंट यूएस से निकल के बाकी कंट्रीज में विजिट करता है तो कैमरे पे दिखने वाली इस सिंपल सी विजिट के पीछे हजारों लोगों की प्लानिंग, कोऑर्डिनेशन और मिलियंस ऑफ डॉलर का सिक्योरिटी मिशन काम कर रहा होता है। तो देखिए एक्चुअल में बिहाइंड द सीन ये सब काम कैसे करता है? यूएस के एजेंट ये सारा का सारा प्लान एग्जीक्यूट कैसे करते हैं? यह सब आपको मैं इस वीडियो में आज स्टेप बाय स्टेप बताऊंगा। देखिए जब भी यूएस प्रेसिडेंट को किसी दूसरी कंट्री में विजिट करना होता है तो इस पूरे अरेंजमेंट में काफी टाइम लगता है। कम से कम 4 से 5 महीने का टाइम चाहिए होता है। अगर अर्जेंट वर्क है, इमरजेंसी विजिट है तब बात अलग है। वरना चार से पांच महीने का टाइम चाहिए होता है सारे अरेंजमेंट्स करने के लिए। तो जब यूएस प्रेसिडेंट के किसी कंट्री में जाने की बात स्टार्ट होती है तो सबसे पहला जो स्टेप होता है उसमें यूएस के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर एनएसए नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल एनएससी और वाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ ये वाइट हाउस के वेस्ट विंग में प्रेसिडेंट के साथ मीटिंग करते हैं। पूरी विजिट की ब्रीफिंग करते हैं।

विजिट के क्या ऑब्जेक्टिव्स हैं? अचीव क्या करना है?

यह सारी चीजें सुनने के बाद जब यूएस का प्रेसिडेंट गो अहेड दे देता है तो उसी टाइम से यह पूरी विजिट का काम ऑफिशियली स्टार्ट कर दिया जाता है। इस मीटिंग के अगले ही दिन ये लोग विजिट की जितनी भी डिटेल्स होती हैं उसको एक डॉक्यूमेंट में लिख के रेडी कर लेते हैं कि किस डेट को जाना है, किस कंट्री में जाना है, ये सारी चीजें लिख के एक डॉक्यूमेंट बना लेते हैं। और ये जो डॉक्यूमेंट होता है, इसको अलग-अलग प्रेसिडेंट के टाइम पे अलग-अलग नाम दिया गया है। लेकिन मोस्टली इसको प्रेसिडेंशियल डिसीजन मेमो बोला जाता है पीडीएम। और इस पीडीएम में जब सारी डिटेल लिखने के बाद जैसे ही वाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ साइन कर देता है तो एक तरह से ये ऑफिशियली कंफर्म हो जाता है कि यूएस प्रेसिडेंट इस डेट को इस कंट्री में जाने वाले हैं और न्यूज़ वगैरह में भी उसी टाइम पे बातें आने लगती है। अब इस डॉक्यूमेंट में साइन होने के बाद सारा का सारा काम शुरू हो जाता है कि प्लानिंग कैसे करनी है। और इसके बाद एक डिटेल्ड प्लान बनाया जाता है।

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जहां पे पूरे लेआउट के साथ किस डील पे फोकस करना है। मान लो इंडिया विजिट करना है तो इंडिया में क्या सिक्योरिटी थ्रेट्स हैं। सारी डिटेल्स इकट्ठा करके इस पूरी ट्रिप का एक और डिटेल डॉक्यूमेंट बनाया जाता है जिसे डायरेक्टिव ऑर्डर्स भी कहते हैं। कभी-कभी इसको ट्रिप डायरेक्टिव ऑर्डर्स भी कह देते हैं टीडीओ। तो यह टीडीओ रेडी होने के बाद इसकी जो कॉपी होती है वो अलग-अलग रेलेवेंट डिपार्टमेंट्स जो होते हैं उनको सिक्योर नेटवर्क के थ्रू भेज दी जाती है। अब इसके बाद सेम वीक में अगर यह ट्रिप प्रायोरिटी पे है तो सेम वीक के अंदर वाइट हाउस के बगल में आइजन आवर एक एग्जीक्यूटिव ऑफिस बिल्डिंग है। यहां पे जितने अलग-अलग डिपार्टमेंट को टीडीओ गया था उन डिपार्टमेंट के लोग मीटिंग करके अपने-अपने डिपार्टमेंट के एक्सपर्ट्स नॉमिनेट करते हैं और एक टीम बनाते हैं। और इसके बाद इसी टीम की जिम्मेदारी होती है इस पूरी विजिट को एग्जीक्यूट करना।इस टीम को एडवांस सर्वे टीम कहा जाता है
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सबसे पहले ये लोग यूएस प्रेसिडेंट जब होस्ट कंट्री में आके जिन-जिन रूट्स का यूज करेंगे उन रूट्स को फाइनलाइज करते हैं। सारे पॉसिबल रूट्स को मार्क करके प्रायोरिटी उन रूट्स को मिलती है जो सीधे सिंपल और फास्ट हो। 15 से 20 मिनट से ज्यादा टाइम ना लगे। और ये बहुत ही डिटेल और छोटी से छोटी चीज को ध्यान में रख के ये लोग डिसाइड करते हैं। प्रेसिडेंशियल कॉन्वॉय रोड पे चलेगा तो सन उनकी तरफ फेस करेगा या नहीं ये तक रिपोर्ट पे मेंशन होता है। और जो रोड डिसाइड होती है उसके भी यूएस के स्टैंडर्ड्स हैं कि इतनी ब्रॉड होनी चाहिए कि प्रेसिडेंशियल कॉन्वॉय आसानी से यू टर्न ले सके। उस रूट के साथ बैकअप रूट भी हो और जो बैकअप रूट है वो भी ऐसा ना हो कि उसमें छोटी-छोटी गलियां जुड़ी हो। ब्लाइंड टर्न्स ना हो। कुल मिला के सारे जितने भी अवेलेबल रूट्स होते हैं उनमें से ये सारी चीजों को देख के जिन रूट्स पे बैरिकेडिंग लगा के क्लियर करना एंट्री एग्जिट बंद हो सके आसानी से क्राउड को रोकना और संभालना आसान हो उन रूट्स को सेलेक्ट किया जाता है और जो भी रूट फाइनलाइज हो लगभग 20 मिनट की दूरी पे एक लेवल वन ट्रॉमा हॉस्पिटल हो वहां और अगर हेलीपैड है उस हॉस्पिटल पे तो उसको भी प्रायोरिटी दी जाती है ताकि अगर हमला वगैरह हो जाए तो इमरजेंसी लैंडिंग करा के ट्रीटमेंट स्टार्ट किया जा सके। अब देखिए रोड के ऊपर जब प्रेसिडेंशियल कॉन्वॉय होता है तो कम्युनिकेशन बहुत इंपॉर्टेंट रोल प्ले करता है। यूएस प्रेसिडेंट दुनिया में कहीं भी किसी भी रोड पे जब ट्रैवल करता है तो वो वाइट हाउस, पेंटागन, यूएस मिलिट्री से इंस्टेंट कांटेक्ट में रहता है और वो भी सिक्योर चैनल के थ्रू। प्रेसिजिडेंशियल कॉन्वॉय जब रोड पे चलता है तो उसमें ऐसे-ऐसे व्हीकल्स होते हैं जिनमें अल्ट्रा सिक्योर कम्युनिकेशन सिस्टम लगे होते हैं। हर गाड़ी का अपना अलग रेडियो सिग्नल कोड होता है ताकि रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम के अंदर भी कोई कंफ्यूजन ना हो। तो इसी वजह से एडवांस टीम जब होस्ट कंट्री के अंदर सर्वे करने आती है तो इस टीम के अंदर वाइट हाउस कम्युनिकेशन एजेंसी डब्ल्यूएससीए के एक्सपर्ट्स भी होते हैं।
जब 2015 में बराक ओबामा आए थे तो आईजीआई एयरपोर्ट का एक बहुत बड़ा सेक्शन डायरेक्ट यूएस सीक्रेट सर्विस के ऑपरेशनल कंट्रोल में दे दिया गया था। तो एडवांस टीम जब सर्वे करती है तो ये सारी चीजों की रिपोर्ट बनाती है कि एयरपोर्ट के कितने एरिया को कंट्रोल में लेने की जरूरत पड़ेगी।

एंट्री एग्जिट पॉइंट कहां से होंगे? लेआउट क्या होगा इसका? स्नाइपर्स और सिक्योरिटी की पोजीशंस कहां-कहां पे मार्क होंगी?

इन सब की रिपोर्ट बनाती है। सबसे पहले बेसिक रिक्वायरमेंट चेक होती है एयरपोर्ट की। जैसे रनवे जो होता है वो 150 फीट वाइड और 10,800 फीट लंबा होना चाहिए। इससे कम नहीं चलता है। एक बार 2009 में एंड्र्यू एयरफोर्स बेस पे रनवे 9755 फीट तक का ही था। तो ओबामा को अपनी फॉरेन ट्रिप के लिए मजबूरी में डेरिस एयरपोर्ट से जाना पड़ा था। तो यह सारी बेसिक रिक्वायरमेंट चेक करने के बाद यह लोग फ्यूल का टेस्ट करते हैं। प्रेसिडेंट का जो प्लेन होता है उसमें जेट ए1 टाइप का फ्यूल यूज़ होता है।
इसके बाद इनकी टीम पूरे एयरपोर्ट पे जितने एलिवेटेड एरिया होते हैं जैसे रूफ, हैंगर, टावर इन सबके ऊपर ऑब्जर्वर पॉइंट्स एंड सिक्योरिटी पोस्ट की जो लोकेशनेशंस होती है उनको मार्क करती है। इन पोजीशंस पे स्नाइपर्स बैठाए जाते हैं। ये स्नाइपर जो होते हैं एयरपोर्ट से एक माइल से भी ज्यादा दूर तक माइक्रोस्कोपिक मूवमेंट जो होती है वो भी डिटेक्ट कर लेते हैं। छोटी सी रिफ्लेक्शन या ग्लास का ग्लेयर तक को ये थ्रेड कंसीडर करते हैं। और ये जितने भी क्यूज मिलते हैं रियल टाइम पे उनका असेसमेंट जो होता है वो सेटेलाइट इमेजरी और ड्रोन के थ्रू होता है। जब होस्ट कंट्री में यूएस का प्रेसिडेंट जाता है तो यूएस अपनी सेटेलाइट की इमेजिंग शेड्यूल और पास्ट प्रायोरिटी चेंज करके होस्ट कंट्री जो होती है वहां पे कवरेज बढ़ा देता है ताकि क्रिटिकल रूट्स और वेन्यूज जो है उनप ज्यादा फ्रीक्वेंट और हाई रेोल्यूशन इमेजरी आए और एयरपोर्ट के बाहर भी 2 से 3 कि.मी. का जो एरिया होता है वहां पे सिविलियन मूवमेंट्स और बिल्डिंग पे नजर रखी जाती है। 2015 में जब यूएस के प्रेसिडेंट आए थे तो एयरपोर्ट के बाहर जो मेट्रो स्टेशन, फ्लाई ओवर, बिल्डिंग रूम्स सबका एक्सेस बंद कर दिया गया था। पूरे एरिया को नो फ्लाई ज़ोन बना दिया गया था। तो ये सारी चीजें देख के एडवांस टीम एयरपोर्ट का भी अपना सर्वे पूरा करती है और रिपोर्ट बनाती है और फिर एयरपोर्ट के बाद ये लोग होटल का सर्वे करते हैं। जनरली इनकी प्रायोरिटी ये रहती है कि जो होटल है वो एयरपोर्ट की लोकेशन से 20 से 30 मिनट की ज्यादा दूरी पर ना हो और इवेंट की लोकेशन से 15 से 20 मिन
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इंडिया के अंदर जनरली दिल्ली का जो आईटीसी मौर्या है इसको सेलेक्ट किया जाता है जब भी प्रेसिडेंट को रुकना होता है। तो ये एडवांस टीम प्रेसिडेंट को जिस होटल में रुकना होता है वहां पहुंच के सबसे पहले यह डिसाइड करती है कि होटल के किस फ्लोर और रूम पे प्रेसिडेंट को रुकवाना सबसे सेफ होगा और ये चीज सेलेक्ट करने के बाद होटल के उस फ्लोर और रूम के ब्लॉकिंग पॉइंट्स मार्क कर देती है। यूएस प्रेसिडेंट जिस फ्लोर पे रुकता है उसके ऊपर और नीचे के जो फ्लोर होते हैं उनमें कौन रहेगा ये सारी डिटेल्स भी मेंशन की जाती है

प्रेसिडेंट के लिए कौन सी लिफ्ट सेपरेट की जाएगी? सीसीटीवी और एक्सरे मशीन के पॉइंट्स कितने एक्स्ट्रा लगेंगे? होटल के जितने भी डोर लॉक्स हैं वो कितने चेंज होंगे?

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ये सारी चीजें मार्क की जाती हैं। होटल में आने के बाद प्रेसिडेंट जो खाना ऑर्डर करता है वो सेम मेन्यू दो जगह एक साथ बनाया जाता है। इन केस अगर किसी एक जगह पे इशू हो जाए तो बैकअप में दूसरा खाना रेडी रहे। तो इसलिए डुप्लीकेट किचन भी बनाया जाता है। इसके साथ-साथ माइक्रोबायोलॉजिकल फूड टेस्टिंग भी सेटअप की जाती है। जो भी प्रेसिडेंट खाता है वो पहले फूड टेस्टिंग टीम से टेस्ट होता है। एक तरह से एडवांस टीम पूरे होटल को लेके उसके लेआउट में जरूरत के हिसाब से चेंज करती है। और फिर इसके बाद होटल की जो वेबसाइट होती है वहां से वर्चुअल व्यू और मैप जो होता है जो सारे लेआउट वगैरह होते हैं उसको हटा दिया जाता है। जितना भी होटल का स्टाफ होता है उसका पुलिस वेरिफिकेशन इनिशिएट कर दिया जाता है। अब ये सारी चीजें करने के बाद सबसे लास्ट में एडवांस टीम जो यूएस प्रेसिडेंट के इवेंट्स होते हैं होस्ट कंट्री में उस लोकेशन का सर्वे करने पहुंचती है। इस लोकेशन पे सबसे पहले ये लोग आसपास की जो ऊंची बिल्डिंग होती हैं जो डायरेक्ट इवेंट लोकेशन की रेंज में रहती हैं उनको सील करने के पॉइंट्स जो होते हैं उनको मार्क करती है। क्योंकि जब इवेंट होता है तो आसपास की सारी बिल्डिंग्स को सील करके उनकी रूफ पे सिक्योरिटी पोस्ट बना दी जाती है। और बाकी जो बचती हैं बिल्डिंग्स उनके हर फ्लोर पे जो लोग रहते हैं उनके फैमिली मेंबर्स की काउंटिंग होती है और पुलिस वेरिफिकेशन होता है।

2015 में जब बराक ओबामा आए थे

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तो ऐसी 71 बिल्डिंग्स थी जिनको सील किया गया था। जो स्टेज बना होता है, इवेंट की जो पूरी लोकेशन होती है, उसको भी बैरिकेडिंग लगा के सील किया जाता है। तो उसकी भी मार्किंग होती है। और ये जो बैरिकेड्स लगाए जाते हैं ये नॉर्मल बैरिकेड्स नहीं होते हैं। ये एंटी रैम ग्रेड 6.8 टन की बैरिकेडिंग होती है। मतलब 80 कि.मी. पर आवर की स्पीड से अगर ट्रक भी अगर इस पे टकराता है तो वो रुक जाता है। और होस्ट कंट्री के जो वीआईपी होते हैं उनको भी अपनी पर्सनल गाड़ी लेके इस इवेंट की लोकेशन पे पहुंचना अलाउड नहीं होता। इंडिया के जो वीआईपीस होते हैं, मिनिस्टर्स होते हैं, उनको भी इस लोकेशन पे डायरेक्ट पर्सनल कार की बजाय बस वगैरह का यूज करके, शटल वगैरह का यूज करके लाया जाता है। जैसे G20 के डिनर के टाइम पे हुआ था। इंडिया के मिनिस्टर्स को बस में लेके वेन्यू पे पहुंचाया गया था।
होस्ट कंट्री लेआउट के हिसाब से प्रिपरेशन स्टार्ट कर देती है और फिर जब प्रेसिडेंट की विजिट में 10 से 15 दिन बचे होते हैं। तब यूएस अपनी सेकंड एडवांस टीम इंडिया भेजती है। ये टीम अप्रूव्ड लेआउट जो होता है जो पहली टीम आई थी जिसने बनाया था उसके हिसाब से सिक्योरिटी, कम्युनिकेशन, कॉन्वॉय मूवमेंट, इमरजेंसी रिस्पांस बाकी सारे क्रिटिकल अरेंजमेंट का लाइव डेमो टेस्ट करती है। तो ये टीम जब इंडिया पहुंचती है यानी कि जब होस्ट कंट्री पहुंचती है तो ये लोग एयरपोर्ट, होटल, रोड, इवेंट लोकेशन हर जगह मॉक ड्रिल स्टार्ट करती है। स्लम एरियाज होते हैं, क्राउडेड एरिया होते हैं तो वहां पे अगर वॉल खड़ी करने की जरूरत होती है तो वॉल खड़ी कर दी जाती है। कैमरा इंस्टॉलेशन, एंटी ड्रोन, रेडार सिस्टम, जैम, सर्िलंस, स्टेज के नीचे वाइब्रेशन टेस्ट सब कुछ करती है ये टीम। एयरपोर्ट पे भी मॉक ड्रिल्स होती हैं। कई केसेस में यह लोग अपने ही लोगों को फेक पासपोर्ट और डमी टिकट देकर भेज देते हैं ताकि यह पता चल सके कि यह जो पूरा सिस्टम है इसमें लूप होल किस जगह पे है। जो रूट्स होते हैं जिनको फाइनलाइज किया जाता है। वहां पे भी प्रेसिडेंशियल कॉन्वॉय बना के टेस्टिंग की जाती है, डेमो किए जाते हैं। और ये सारी चीजें करने के बाद यह एडवांस टीम और यूएस सीक्रेट सर्विस के लोग पूरा जो होटल होता है उसको अपने कंट्रोल में ले लेते हैं। होटल के रूम, कॉरिडोर, वेंटिलेशन सिस्टम, किचन पूरे होटल का सिक्योरिटी सर्च यूएस दोबारा से करता है। प्रेसिडेंट के रूम और फ्लोर को कॉमन यूज़ से हटा दिया जाता है। वहां पे बुलेट प्रूफ बैलेस्टिक ग्लास लगा दिए जाते हैं। इमरजेंसी ऑक्सीजन सप्लाई का भी अरेंजमेंट होता है। टीवी यूनिट जितने इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम होते हैं इनको रिप्लेस कर दिया जाता है। कहीं कोई लिसनिंग डिवाइस और ये सारी चीजें ना हो ये सब भी चेक होता है। होटल के अंदर वॉर रूम भी सेटअप किया जाता है। कुछ केसेस में एंबेसी में भी किया जाता है। लेकिन जनरली होटल के अंदर एक वॉर रूम सेटअप किया जाता है
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इसमें 300 से ज्यादा यूएस के सीक्रेट सर्विस एजेंट होते हैं इस इनर सर्किल के अंदर जो फिजिकली प्रेसिडेंट को शील्ड करते हैं। कार में बैठाना हो, रूम तक ले जाना हो सब यही करते हैं। ये जो पूरा सिक्योरिटी सर्कल होता है, यह करीब 10 से 15 कि.मी. तक होता है। और एयर स्पेस की भी बात करें तो जनरली 18 से 18 टू 56 कि.मी. की जो रेंज होती है इसमें से कोई भी एक रेंज सेलेक्ट करके एयर स्पेस को भी नो फ्लाई ज़ोन बना दिया जाता है। तो ऊपर नीचे आगे पीछे पूरी सिक्योरिटी में प्रेसिडेंट रहता है। इसके बाद ये जो पूरा एरिया जहां प्रेसिडेंट को रहना होता है इवेंट अटेंड करने होते हैं। उस पूरे एरिया के अंदर जो क्रिमिनल्स होते हैं जिनका पुराना रिकॉर्ड होता है पुलिस स्टेशन के अंदर या कोई शक होता है कि यह कुछ थ्रेट कर सकते हैं। एज अ प्रिकॉशनरी मेजर उनको भी उठा उठा के जेल में डाला जाता है। और अगर यह डाउट होता कि कोई एक्टिविस्ट वगैरह इवेंट में कुछ प्रोटेस्ट वगैरह करने की कोशिश कर सकते हैं तो उनको भी जेल में डाल दिया जाता है। जब ओबामा आए थे तो उस टाइम पे भी सीपीआई के कई सारे लोग थे जिनका लग रहा था कि ये प्रोटेस्ट वगैरह करेंगे एम्बेसी के बाहर तो उनको भी उठा के प्रिवेंटिव कस्टडी में डाल दिया गया था।
यूएस प्रेसिडेंट के आने से कुछ दिन पहले इस पूरे लेआउट इस पूरी प्रिपरेशन का जितना भी सामान होता है उसको लाया जाता है और इन सारे सामान को लाने के लिए दो से तीन C17 ग्लोब मास्टर कार्गो जो होते हैं उनका यूज किया जाता है। इनके अंदर सामान रख के यूएस से इंडिया भेज दिया जाता है। ट्रंप के टाइम पे तीन से चार C17 कारगो में सामान आया था। तो इन C17 ग्लोब मास्टर को जब इंडिया भेजा जाता है तो इनके अंदर बड़े-बड़े हेलीकॉप्टर्स वगैरह होते हैं। उनके विंग्स वगैरह उनको पूरा खोल के अंदर रख दिया जाता है। यूएस प्रेसिडेंट जिस गाड़ी से चलते हैं द बीस्ट जो उसकी बैकअप गाड़ी होती है। कॉन्वॉय के अंदर जितने भी अलग-अलग तरीके के व्हीकल्स होते हैं सब के सब इसी कारगो में प्रेसिडेंट के आने से पहले होस्ट कंट्री यानी कि इंडिया के अंदर पहुंचा दिए जाते हैं। पूरे कॉर्नवो के अंदर जितने भी व्हीकल्स, रेडार सिस्टम्स, स्नाइपर्स, हॉकई, जैमर, K9 स्क्वाड्स के डॉग्स सब कुछ इन्हीं कारगो में डाल के यूएस प्रेसिडेंट के आने से पहले इंडिया में पहुंचा दिया जाता है। अब इसके बाद वो डेट आती है जिस दिन यूएस प्रेसिडेंट को इंडिया आना होता है।

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यहां पे दो एक जैसे दिखने वाले बोइंग 747200 बीच जिनकी टेल पे 28000 और 29000 लिखा होता है। ये ऑलरेडी वहां पे खड़े होते हैं। इनको एयर फोर्स वन कहा जाता है और इसी एयरफोर्स वन में प्रेसिडेंट अपनी टीम के साथ बैठ जाते हैं। जिस टाइम पे प्रेसिडेंट एयरफोर्स वन में जा रहे होते हैं तो आपने देखा होगा उनके बगल में जो सिक्योरिटी गार्ड्स होते हैं उनके हाथ में एक ब्लैक बैग होता है। इसको न्यूक्लियर फुटबॉल या फिर कुछ लोग द फुटबॉल कहते हैं। इस बैग के अंदर एक ब्लैक बुक होती है जिसमें न्यूक्लियर वॉर के डिफरेंट स्ट्राइक ऑप्शंस और इमरजेंसी प्लांस होते हैं। इसके साथ एक और बुक होती है जिसमें क्लासिफाइड सेफ लोकेशनेशंस होती हैं जिसमें इमरजेंसी में प्रेसिडेंट जाके छुप सके और इसके साथ में एक 3/5 इंच का कार्ड होता है जिसको बिस्किट कहते हैं। इस कार्ड पे प्रेसिडेंट के ऑथेंटिकेशन कोड्स होते हैं। इस कोड के थ्रू प्रेसिडेंट पेंटागन में अपनी आइडेंटिटी वेरीफाई करके किसी भी न्यूक्लियर ऑर्डर को वैलिडेट कर सकते हैं। और यह सारी चीज एयरफोर्स वन में जब प्रेसिडेंट उड़ रहे होते हैं तब करी जा सकती है। और देखिए यह एयरफोर्स वन कोई मॉडल नहीं है। जिस भी एयरक्राफ्ट में यूएस का प्रेसिडेंट ट्रैवल करता है उसका कॉल साइन एयरफोर्स वन होता है। एक्चुअली एक बार यूएस के प्रेसिडेंट एयरफोर्स 8618 में ट्रैवल कर रहे थे और उसी एयर स्पेस में एक कमर्शियल फ्लाइट ईस्टर

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