
उम्र गालिब यह भूल करता रहा धूल चेहरे पर थी और मैं आईना साफ करता रहा। न जाने क्यों बिहार चुनावों के बाद गालिब का यह शेर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को लेकर मन में आता है। मतलब बहुत सारे लोग हैं देश में जो पूछ रहे हैं कि राहुल जी और कांग्रेस का आलाकमान क्या वाकई में एक अलग दुनिया में जी रहे हैं? एक ऐसी दुनिया जिसका जमीन, जनता, वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं। मतलब अपनी राजनीतिक यात्रा में 90 प्लस चुनाव हार चुके राहुल गांधी जी कब समझेंगे? कब समझेंगे कि जो मुद्दे वो उठा रहे हैं उससे जनता नहीं कनेक्ट कर पा रही है। जिस भाषा में वो हाइड्रोजन बम फोड़ रहे हैं वो जिस राज्य में चुनाव है वहां की जनता नहीं समझ पा रही है। और जहां जाके वह प्रचार कर रहे हैं और जिन तस्वीरों को दिखाकर उनका आईटी सेल मास्टर स्ट्रोक कह रहा है। उन्हें कर्पूरी ठाकुर से तुलना कर रहा है। जननायक बता रहा है। उसी इलाके में चुनाव में उनको वोट नहीं मिल पा रहा। हां फर्जी नहीं कह रहे इसी चुनाव में राहुल गांधी साहब जिस तालाब में कूदे थे और मुकेश सहनी के साथ मछली पकड़े थे वही उम्मीदवार जो है 31000 वोट से हारा है और यहां आईटी सेल वाला जननायक कर्पूरी ठाकुर मास लीडर फलाना ढिमकाना सब करता रहा और यह किसी एक चुनाव की बात नहीं है।

हर चुनाव में ऐसे ही हवाबाजी में चुनाव लड़वाई जाती है। उसके बाद कभी वोट चोरी, कभी ईवीएम के नाम पर ऐसा लगता है कि अपनी कमजोरियों को ढक ले आता है। सवाल ये है कि क्या ये जिम्मेदारी से बचने का तरीका नहीं और क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही है?मतलब बीते कई सालों में लोग कह रहे हैं कि यार बीजेपी कई काम खराब कर रही है। लेकिन फिर भी बीजेपी जाती नहीं है। अब उसकी दो वजह हो सकती है। एक बीजेपी अपना गलती से ठीक कर लेता हो। दूसरा कांग्रेस सब जनता के भरोसे छोड़े बैठा है। वह समझना ही नहीं चाहती। वरना यह कितना मुश्किल है कि जिस बिहार में महागठबंधन में कांग्रेस तेजस्वी और मुकेश सहनी के साथ लड़ रही थी और जिन दोनों पार्टियों को यह बात समझ में आ रही है कि हम चुनाव हारे हैं। मुकेश सैनी चुनाव परिणाम आने के बीच में कह रहे थे कि हां भैया वो 10,000 जो रुपया गया वह काम आ गया। उनका गठबंधन बेहतर हो गया। तेजस्वी की आरजेडी आज ट्वीट कर रही है कि भाई लोकतंत्र में होता रहता है। हारजीत होती रहती है लेकिन हम लड़ेंगे अगली बार बेहतर करेंगे। वहीं पर कांग्रेस अभी भी उलझी पड़ी है कि नहीं नहीं जी जब चुनाव ही स्वस्थ नहीं हुआ तो जीतेंगे कैसे? मतलब सीरियसली कई बार ऐसा लगता है कांग्रेस का कंपटीशन बीजेपी से जमीन से ज्यादा सोशल मीडिया पर है कि जी भाई देखिए बीजेपी का इतना लाइक आ रहा है हमारा इतना लाइक आता है उनका इंगेजमेंट इतना है हमारा इतना है क्योंकि बिहार जो जो गया हर वो पत्रकार जो बिहार गया आप उठा कर देख लीजिए उसकी टाइमलाइन चाहे वो एक्स पर हो Facebook पर हर पत्रकार चुनाव के बाद यह कहा कि भैया हमको पता था कि बीजेपी एनडीए वहां जीत रही है।

यह नहीं सोचे थे। हमको आप एक पत्रकार दिखा दीजिए। एक पत्रकार या एक वो व्यक्ति जिसने यह कहा हो कि कांग्रेस पार्टी जो 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है वो 50 सीटों पर जीत जाएगी। 30 पर जीत जाएगी। 99% आदमी इस बात को कह रहा था कि कांग्रेस पार्टी जो है अगर वो डबल डिजिट में गई तो यह उसके लिए जीत होगी और वो नहीं गई और ये सब जानते हुए आखिर में फिर वही स्टेटमेंट कि चुनाव फेयर नहीं था जी सब फर्जीवाड़ा है जी सब ऐसा है अरे सच यह है कि कांग्रेस आरजेडी की टांग पकड़ कर लड़ रही थी दुनिया इस बात को जानती थी कि अगर आरजेडी अच्छा करेगी तो कांग्रेस अपने आप अच्छा कर लेगी वैसे ही जैसे जैसे यूपी में अखिलेश जी अच्छा करते हैं तो कांग्रेस अच्छा कर लेती है। लेकिन इस बात को कांग्रेस क्यों नहीं समझती? वो भी तब जब आरजेडी समझ रही है। मुकेश सहनी समझ रहे हैं और जनता बार-बार समझा रही है। क्यों ऐसा हो रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस अपने उन्हीं पेड यूर्स की तरह वास्तविकता से दूर है। हां, वही पेड यूट्यूबर जो बिहार नहीं गए होंगे। विदेश में बैठकर हर चुनाव में कांग्रेस को जितवा देते हैं। हर बार बीजेपी हारेगी, कांग्रेस जीतेगी। नतीजा आता है चुप। या वो दूसरे वाले जो एग्जिट पोल में भी जीिताते हैं, ग्राउंड पे भी जीताते हैं और हारने के बाद कांग्रेस के हर रोज अपने स्टूडियो में बैठ के बीजेपी की सरकार गिराते हैं और फिर बड़ी बेशर्मी से हम नंबर वन हैं हम नंबर वन है कहकर इतराते हैं। देखिए उनकी बेशर्मी से इस देश को घंटा फर्क पड़ता है। वो क्या कहते हैं क्या करते हैं उन्हें लोग गंभीरता से नहीं लेते लेकिन कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है।हां इतना जरूर हैरानी हो रही है कि इतना बड़ा जीत जाएगी

मजबूत लोकतंत्र के लिए कांग्रेस का मजबूत होना जरूरी है क्योंकि इस देश में किसी और पॉलिटिकल पार्टी में वह ताकत नहीं है कि वह बीजेपी को उस तरह चुनौती दे सके क्योंकि बाकी क्षेत्रीय पार्टियां ऐसे में कांग्रेस जब अपने आप को ही गंभीरता से नहीं ले रही। जनता को गंभीरता से ले रही है। मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही तो यह सवाल उठता है कि अपनी हार की नाकामियों को छुपाने के लिए जो बहाने वो रख रहे हैं उससे वह खुद को समझा रहे हैं या जनता को मना रहे हैं? और क्या यह जनता के मतों का अपमान नहीं है? यह सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है। और इसीलिए आज हमारा सवाल है कब तक राज कब तक कांग्रेस। आज इस वीडियो में कांग्रेस की स्ट्रेटजी को लेकर हम चर्चा करेंगे। हम समझेंगे कि क्यों ऐसा हो रहा है। जो बातें वो कह रहे हैं क्या उसमें दम है और क्यों कांग्रेस वास्तविकता से? हमारी गुजारिश है कि आप हमारे WhatsApp चैनल से जुड़े क्योंकि इलेक्शन को लेकर जो ये वीडियोस हम बना रहे हैं या जो भी देश पे विषय हैं उनमें हमारा आपका रिश्ता थोड़ा और प्रगाढ़ हो जाए। यह वीडियोस आप तक बिना ढूंढे पहुंच जाए तो उसके लिए आपको हमारे WhatsApp से जुड़ना पड़ेगा। लिंक हमने डिस्क्रिप्शन में कमेंट सेक्शन में दे रखा है। अब बात करते हैं कांग्रेस और बिहार चुनाव की। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे अब स्पष्ट हैं। ऐतिहासिक जीत मिली है।स्ट्राइक रेट कमाल का है। महागठबंधन का प्रदर्शन निराशाजनक है। सच यह भी है कि महागठबंधन की हार राहुल गांधी कांग्रेस की अकेले की नाकामी नहीं है। महागठबंधन के अंदरूनी कमजोरियों का नतीजा है। कहा है कि महागठबंधन जो था वो इस बात का डिस्कशन कर लिया था कि जी फलमा मुख्यमंत्री बनेगा, धमकवा डिप्टी सीएम बनेगा, कौन कैबिनेट बनेगा? बस इस बात को डिस्कस नहीं किया था कि चुनाव कैसे जीता जाएगा और इस बात को कांग्रेस के अलावा बाकी सब समझ गए हैं। मुकेश सैनी भी समझ गए हैं। वो हकीकत से मुंह नहीं मोड़े। लेकिन हार के बाद भी राहुल गांधी और कांग्रेस वोट चोरी का दावा कर रहे हैं। और अब यह हास्यास्पद लग रहा है। उनको भी जो कांग्रेस में कल तक थे। उदाहरण के तौर पर बिहार कांग्रेस के पूर्व मंत्री शकील अहमद एक जमाने में टीवी पर दिनभर प्रवक्ता के तौर पर इनको हम देखते थे। शकील अहमद कहते हैं कि अगर मान लो 65 लाख वोट चोरी हो तो ऐसा क्यों नहीं हुआ कि 65 लोग भी सड़कों पर उतरे और अगर मान लो हुआ है वोट चोरी हुआ है ईवीएम हैक होता है तो फिर आपके पास समय है 45 दिन मिलता है ना भाई चुनाव आयोग में जाइए शिकायत दर्ज करवाइए सुप्रीम कोर्ट में जो लड़ाई है उसको और जोर शोर से लड़िए आपके ऊपर कई सारे राजनीतिक मुकदमे भी तो हैं ना लड़ लड़िए उनको जहां पर इलेक्शन कमीशन साथ नहीं दे रहा उसको उठाइए।

इन्हीं सारे मसलों को लेकर भी डीएम के चुनाव जीतती है। इन्हीं सारे मसलों को लेकर लेकर टीएमसी जीतती है। इन्हीं सारे मसलों के बीच में आपने 204 लोकसभा में अच्छा किया था। तो जब हार गए तो फिर जिम्मेदारी से बचने के लिए इसे बचकाने बहाने क्यों चले गए? क्योंकि अगर तेजस्वी जी को एहसास है, अगर मुकेश सहनी को एहसास है तो कांग्रेस को ये एहसास क्यों नहीं है? और इसकी वजह हमको लगता है कई बार कि वो सोशल मीडिया की दुनिया को असली दुनिया समझती है। क्योंकि यूबर लोग तो लिख रहा है कि भैया चुनाव लड़ना ही नहीं चाहिए कांग्रेस को।एक्स नहीं चलाती है। यूपी, बिहार जैसे बड़े राज्यों में जनता को रोजमर्रा की जरूरतें प्रभावित करती हैं। रोजमर्रा की जातीय कॉम्बिनेशन काम करते हैं। सड़क, बिजली, पानी, जातीय समीकरण, रोजगार ये सब काम करता है। यूबर का हेडलाइन नहीं चलता। उसको मजा लेता है आधी बैठ के चाय पीते-पीते। वो आदमी जो खलियर है। और यही बात शायद तेजस्वी जी समझ गए। इसीलिए हार के बाद सिंपल तरीके से एक पोस्ट लिखा जो एप्रिशिएट किया जा रहा है कि जीत हार राजनीति का हिस्सा है। उनकी पार्टी गरीबों के लिए लड़ रही थी। लड़ेंगे। लेकिन आप कांग्रेस का सोशल मीडिया उठा लीजिए। उनके यूर्स उनके Twitter हैंडल्स की भाषा देख लीजिए। वास्तविकता से कोसों दूर कोसों दूर अभी भी चल रहा है कि अगर आपको लगता है कि 90% 91 स्ट्राइक रेट है तो ऐसा वैसा इलेक्शन फेयर नहीं हुआ, फ्री नहीं हुआ। वो यूर्स जो बिहार गए थे, आप उनकी बाइट देखिए। चुनाव से पहले रिजल्ट से पहले बात कर रहा हूं मैं रिजल्ट के बाद की नहीं। उदाहरण के तौर पर एग्जांपल देता हूं। एक मैं एक वीडियो मैंने देखा राजीव रंजन जी का माहौल क्या है और अजीत अंजुम जी का। और इन दोनों ने पूरा बिहार घूमा। यह दो वो हैं जिन पर कभी बीजेपी से करीबी होने का आरोप नहीं लगा कि यह लोग बीजेपी के करीबी हैं। आप इनका भी स्टेटमेंट सुनेंगे तो इन दोनों ने स्पष्ट तौर पर उस वीडियो में कहा था कि बिहार में वोटर अधिकार यात्रा का इंपैक्ट नहीं पड़ा। वोट चोरी का इंपैक्ट नहीं पड़ा। वहां भी फुल टाइम पॉलिटिक्स का जिक्र हो रहा था। और यह मैं नाम ले इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि एक बड़ा दर्शक है कांग्रेस का विपक्ष का जो उनको सुनता है। हम भी सुनते हैं। हर आदमी को सुनना चाहिए और यह वो लोग हैं जो कभी भी प्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी से नजदीक नहीं रहे। विपक्ष के लोगों में इनका सम्मान अच्छा है। वो भी खुलकर यह कह रहे हैं कि जो मुद्दे उठाए गए।

ईवीएम है ना संविधान खतरा, वोट चोरी वो बिहार की जनता को उतना समझ में नहीं आए। अजीत जी तो यहां तक कह दिए कि वो राहुल तेजस्वी की सभाओं में भी गए थे।ज्यादातर मुस्लिम और यादव समुदाय के लोग थे। ओबीसी और बाकी पिछड़ा वर्ग जो था नहीं था। यह भी कहा कि युवा कांग्रेस के लोग जो है राहुल गांधी की रैली में भीड़ इकट्ठा कर रहे थे। बाहरी गाड़ियां जो है वो नजर आ रही थी। बिहार की यात्रा में बिहार के लोग जो है वो कांग्रेस में कम नजर आ रहे थे। अब सवाल यह उठता है कि भैया अगर बिहार में बिहारी नहीं था और वहां पर वो समीकरण नहीं दिख रहा था वो कनेक्शन नहीं दिख रहा था तो ये सारी हवाबाजी सोशल मीडिया के लिए और अगर ये सोशल मीडिया के लिए तो क्या सोशल मीडिया पर ही चुनाव लड़ा जा रहा है और फिर लड़ा जा रहा है तो सोशल मीडिया परसेप्शन बनाया जा रहा है व लिख दिया जा रहा है कि जी चुनाव फेयर नहीं थे लेकिन कांग्रेस इन सबको मानने को तैयार नहीं है वो अजीत जी को भी गरी आने लगी फिर उनको भी सफाई देना पड़ा भाई कि हम बीजेपी वाले नहीं हैं। हम नहीं है बीजेपी वाले। और यहां भी कमेंट सेक्शन में कई लोग आ जाएंगे कि अरे आप भी बीजेपी वाला बोल रहे हैं। अरे भाई नहीं बोल रहे हैं। कांग्रेस मजबूत होगी तो पत्रकारिता भी मजबूत होगी ना। भाई विपक्ष मजबूत होगा तो देश में और आसान होगा सवाल उठाना और मुद्दे उठाए जाएंगे। जनता का हित होगा यार। एक के पार्टी अगर मजबूत रहेगी। एक पार्टी के बारे में अगर पता होगा जीतने में ना खबर कवर करने में मजा आएगा और ना जनता का बहुत हित हो पाएगा। जब सवाल जवाब होता है, प्रेशर होता है तो फिर लोकतंत्र बढ़िया से चलता है। और यह समझने वाली बात है। तेजस्वी जी ने कई अच्छे मुद्दे उठाए थे। जैसे रोजगार वाला मुद्दा अच्छा था। लेकिन थोड़ा अतिशयोक्ति था। हर घर सरकारी नौकरी थोड़ा अतिशयोक्ति था। जनता नहीं कनेक्ट कर पाई। नीतीश बाबू से कनेक्शन अच्छा है उनका वोट चोरी जैसा मुद्दा ऐसा लगा कि जनता को एक्सेप्ट करो उसके लिए था हो सकता है वोट चोरी हो कुछ तरीके से हो हमको नहीं पता लेकिन मास कनेक्शन नहीं था ऊपर से अंग्रेजी में बोल के हाइड्रोजन बम फोड़ा गया तो नहीं कनेक्ट हुआ ना भाई और अब हार के बहाने वोट चोरी जमीनी मुद्दों से नहीं तो फिर अगली बार यही होगा। अरे यह वक्त है आत्म मंथन का बहाना बनाने का नहीं। बंगाल में चुनाव होगा। ममता दीदी पसीना छुड़ा देंगी। बीजेपी का पसीना छूट जाएगा।

यही सारा सिस्टम वहां भी होगा। बीजेपी हारेगी, ममता जीतेंगी या ममता हारेंगी, बीजेपी जीतेगी हमको नहीं पता। लेकिन बंगाल में वॉकओवर नहीं मिलेगा। नेक टू नेक लड़ाई होगी। क्योंकि ममता दीदी अभी से तैयार होंगी एसआईआर के लिए ममता दीदी अभी से तैयार होंगी वोट बैंक के लिए स्ट्रेटजी के लिए कॉम्बिनेशन के लिए वो जो कांग्रेस नहीं कर रही अगर कांग्रेस को जीतना था तो बिहार की जनता की भाषा बोलनी होगी ना कि दिल्ली के स्टूडियो की बाकी वोट चोरी की बात करें सारा भरा पड़ा है कमेंट सेक्शन कि भैया वोट चोरी से इतनी बड़ी जीत हो सकती है। ईवीएम हैक हो गया होगा। सब कांग्रेस वाले यही कह रहे हैं कि भैया इलेक्शन कमीशन बीजेपी की जेब में है। अरे भैया वोट चोरी का तरीका होता है? वोट चोरी सच कहें तो आज से नहीं शुरू से होती आ रही है। फर्जी वोटर का नाम जुड़वा देना, बूथ पर फर्जी वोटिंग करवा देना, किसी को जान ना देना कि पहुंचवे नहीं करोगे तो होगा कहां से? धमकी देना लेकिन फर्क है आप ग्राउंड पर कितने मजबूत है प्रशांत किशोर हारे क्योंकि बूथ लेवल पर कमजोर थे नहीं था सोशल मीडिया पे हवाबाजी थी ग्राउंड पे नहीं था बीजेपी का जो विपक्ष भी तारीफ करता है कि उनका पन्ना प्रमुख बूथ पर इतना मजबूत है कि वोटिंग को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं। हर एक व्यक्ति ले जाना वोट डलवा के वापस छोड़ जाना। बाकी जो आरोप है वह टेक्निकल है। सीसीटीवी फुटेज क्या रहा? क्या डिलीट किया गया? वोटिंग डाटा कैसा रहा? उसके लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़िए ना अच्छे से। देश की सुप्रीम कोर्ट में तो भरोसा है ना भाई सबको। कई सारे फैसलों में आप भी बाहर हैं। बीजेपी, कांग्रेस पे, कांग्रेस, बीजेपी पे, बीजेपी, सपा पे, बीजेपी, आरजेडी पे सब पर एक दूसरे पर केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने हर बार सबको न्याय दिया है ना तो उस पे भी करिए। लेकिन अगर आप 61 में से पांच सीट जीत रहे हैं तो फिर सारा जो है ठीकरा वो वोट चोरी पर थोकेंगे तो बेईमानी लगता है फिर लगता है कि आप जनता को क्यूट समझ रहे हैं ये आप समझना नहीं चाहते हैं जनता को सही तरीके से और ये आज से नहीं कई सारी चीजें वो कांग्रेस ने उठा

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