
डायमंड्स विश्व में सबसे पहले भारत में पाए गए जिसके कई साक्ष्य फोर्थ सेंचुरी की ट्रेड में मिलते हैं माना जाता है कि भारत से डायमंड्स की खरीद फरोख्त सिल्क रूट के माध्यम से बाकी के देशों में होती थी लेकिन अब तक कोई ऐसे हीरे का टुकड़ा नहीं मिला था जिसे देखकर लोग बस देखते ही रह जाए वक्त बीतने के साथ हीरा बेशकीमती स्टोन के तौर पर अपनी जगह बना चुका था 13 सेंचुरी में जहां पूरी दुनिया में एक भी हीरे की खान नहीं थी तभी भारत में एक ऐसे हीरे की खोज हुई जिसकी चमक के आगे बड़े-बड़े राजाओं की आंखें चौंदी आ गई थी यह हीरा बेहद ही अनोखा था तब कहां किसी को पता था कि यह हीरा आने वाले दिनों में इतना यूनिक और बेशकीमती होगा कि जो भी इसे देखेगा बस देखता ही रह जाएगा जैसे-जैसे इसकी पॉपुलर बढ़ती गई वैसे ही उस समय के राजाओं में इसे हासिल करने की होड़ बढ़ गई आज की कहानी है कोहीनूर की भारत की कोक से निकला व हीरा जो आज ब्रिटेन की धरोहर बना हुआ है ऐसा नहीं है कि कभी भारत की शान में चार चांद लगाने वाला कोहीनूर रातों-रात ब्रिटेन च ला गया या फिर उन्होंने इसे किसी युद्ध में छीन लिया कोहीनूर की कहानी बहुत लंबी है भारत में एक रजवाड़े से होते हुए दूसरे रजवाड़े की सैर करते हुए फाइनली यह हीरा ब्रिटिश क्राउन को सो कॉल्ड गिफ्ट के तौर पर दे दिया गया था यहां एक और बड़ी मजेदार बात यह है कि मुगल सल्तनत के ताजो तख्त से होते हुए क्वीन विक्टोरिया के सर का ताज बनने तक के सफर में इस हीरे को कभी खरीदा या बेचा नहीं गया शायद इसी वजह से आज तक यह हीरा बेशकीमती माना जाता रहा है

पर कोहीनूर की एक अपनी कहानी रही है इसकी चमक में कई लोगों का खून लगा हुआ है और इसकी चाहत के कई किस्सों से दुनिया आज तक बेखबर है तो चलिए आपको ले चलते हैं कोहिनूर की चमकीली कहानियों में और आपको बताते हैं इसके वोह किस्से जो इसकी चमक के पीछे गुम हो गए हैं इंडियन गवर्नमेंट हैज सेड इट वड मेक ऑल पॉसिबल एफर्ट्स टू गेट बैक द प्राइसलेस कोहिनर डायमंड दैट इज पार्ट ऑफ द क्वीन मदर क्राउन मलिक काफूर ने उस मंदिर को डिस्ट्रॉय करके वहां से ले आए दिस इंक्रेडिबल जल है नॉट जस्ट बन पा ्र फ ्र ए प आ यवर न आई ब एक्टिंग डायमंड वा टेकन बा बकं इं कोहीनूर के रिजिन के बारे में कई तरह की कहानिया प्रचलित है ऐसी कहानी अनुसार इस हीरे को करीब 5000 साल पहले जामवंत जी ने भगवान श्री कृष्ण को दिया था महाभारत काल में इस हीरे को सन मं तक मणि के नाम से जाना जाता था लेकिन इसके बारे में कहानी यही खत्म नहीं होती जहां कोहीनूर को महाभारत काल का बताया जाता है


तो वही यह भी कहा जाता है कि इस हीरे को 3200 साल पहले एक नदी में पाया गया था खैर सच्चाई जो भी हो लेकिन आज तक इस हीरे की ओरिजिन के बारे में एक्यूरेट और वैलिड इंफॉर्मेशन जुटाई नहीं जा सकी है कोहीनूर अपने खोजे जाने के वक्त दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड था और उसका कुल वजन 793 कैरेट्स के आसपास था बाद में इस हीरे को कई बार तराशा गया है जिसकी वजह से इसका वजन घटकर 105.6 कैरेट के आसपास रह गया है हालांकि कई बार तराशे जाने के बावजूद कोहिनूर अब भी दुनिया के सबसे बड़े तराशे हुए हीरो में से एक बना हुआ है कई दावों के हिसाब से कोहीनूर की कहानी 13th सेंचुरी में शुरू होती है जब आज के आंध्र प्रदेश में काकतीय डायनेस्टी का राज था उन्हीं दिनों वहां के गोल कोंडा में कोई एक ही खदान थी जिनकी खुदाई की जा रही थी यही के कोलूर माइंड्स में कोहिनूर की खोज हुई कोहिनूर के खोजे जाने के वक्त भारत में राजा महाराजाओं का दौर हुआ करता था इसलिए जब भी कोई बेशकीमती चीज खोजी जाती उसे राजा के पास पहुंचा दिया जाता था


तो वही यह भी कहा जाता है कि इस हीरे को 3200 साल पहले एक नदी में पाया गया था खैर सच्चाई जो भी हो लेकिन आज तक इस हीरे की ओरिजिन के बारे में एक्यूरेट और वैलिड इंफॉर्मेशन जुटाई नहीं जा सकी है कोहीनूर अपने खोजे जाने के वक्त दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड था और उसका कुल वजन 793 कैरेट्स के आसपास था बाद में इस हीरे को कई बार तराशा गया है जिसकी वजह से इसका वजन घटकर 105.6 कैरेट के आसपास रह गया है हालांकि कई बार तराशे जाने के बावजूद कोहिनूर अब भी दुनिया के सबसे बड़े तराशे हुए हीरो में से एक बना हुआ है कई दावों के हिसाब से कोहीनूर की कहानी 13th सेंचुरी में शुरू होती है जब आज के आंध्र प्रदेश में काकतीय डायनेस्टी का राज था उन्हीं दिनों वहां के गोल कोंडा में कोई एक ही खदान थी जिनकी खुदाई की जा रही थी यही के कोलूर माइंड्स में कोहिनूर की खोज हुई कोहिनूर के खोजे जाने के वक्त भारत में राजा महाराजाओं का दौर हुआ करता था इसलिए जब भी कोई बेशकीमती चीज खोजी जाती उसे राजा के पास पहुंचा दिया जाता था इसी तरह कोहीनूर के मिलते ही उसे काकतीय डायनेस्टी के राजा के पास पहुंचा दिया गया राजा इसकी सुंदरता और चमक से बेहद प्रभावित हुए और इस हीरे को उन्होंने अपनी कुलदेवी भद्रकाली की बाई आंख में लगवा दिया जल्दी ही इसकी चर्चा पूरे भारत में हो लगी और इसकी खबर दिल्ली सल्तनत के राजा अलाउद्दीन खिलजी के पास भी पहुंची उन दिनों खिलजी अपने एंपायर के एक्सपेंशन के बड़े सपने देख रहा था और भारत के दक्षिणी हिस्से में भी अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था कुछ महीनों बाद मलिक काफूर की कमांड में खिलजी की सेना ने काकतीय डायनेस्टी पर हमला कर कोहिनूर को लूट लिया जिसके बाद कोहिनूर अलाउद्दीन खिलजी के पास आ गया और दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बन गया आगे चलकर खिलजी हों को हराकर तुगल कों ने दिल्ली सल्तनत पर अपना कब्जा जमा लिया तब तक कोहिनूर इतना पॉपुलर हो गया था


कि जब भी कोई राजा दूसरे को हराता व हारने वाले राजा से कोहिनूर ले लेता इसी तरह कोहिनूर भी खिलजी हों से होकर तुगल कों के पास चला गया तुगल कों के पास पहुंचने के बाद कोहिनूर फिरोज शाह तुगलक के पास आ पहुंचा आगे चलकर तुगल कों से होते हुए कोहीनूर मालवा के राजा होशंग शाह के हाथों में आ गया मालवा का राजा बनने के बाद होशंग शाह अपने पड़ोसी राज्य ग्वालियर को जीतना चाहता था उस समय ग्वालियर पर तोमर राजा डोंगें द्र सिंह शासन कर रहे थे होन शं शाह ने मौका पाते ही ग्वालियर पर अटैक कर दिया लेकिन वो डोंगें द्र सिंह से बुरी तरह हार गया अपनी जान बचाने के लिए होंस शाह ने कोहिनूर समेत अपनी सारी संपत्ति डोंगर द्र सिंह को सौंप दी इस घटना का जिक्र बाबर नामा में भी मिलता है जो इस हीरे का फर्स्ट डॉक्यूमेंटेशन भी है डोंगें द्र सिंह से होते हुए यह हीरा अंतिम तोमर शासक राजा विक्रम आदित्य के पास पहुंच गया उस समय तक दिल्ली सल्तनत की सत्ता इब्राहिम लोधी के हाथों में आ गई थी इब्राहिम लो ने भी कोहीनूर के बड़े चर्चे सुन रखे थे इसलिए उसने अपने साम्राज्य का विस्तार करने और इस हीरे को पाने के लिए ग्वालियर पर अटैक कर दिया इस युद्ध में राजा विक्रमादित्य की हार हुई हार के बाद राजा विक्रमादित्य को कोहीनूर समेत अपनी सारी संपत्ति इब्राहिम लोधी के आगरा किले में रखनी पड़ी लेकिन इब्राहिम लोधी की जीत की यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई और केवल एक साल बाद ही उसे अपनी सत्ता और कोहिनूर दोनों को बाबर के हाथों गवाना पड़ा दरअसल उस दौरान बाबर दिल्ली पर राज करने के सपने संजोए 1519 से ही भारत पर कई बार आक्रमण कर चुका था लेकिन उसे हर बार यहां से हार कर लौटना पड़ता था 1526 में बाबर ने एक बार फिर से भारत पर आक्रमण किया इस बार उसकी लड़ाई इब्राहिम लोधी के साथ पानीपत में हुई कई दिनों तक चले इस घमासान युद्ध में इब्राहिम लोधी मारे गए इस तरह कोहीनूर बाबर के कब्जे में आ गया बाबर ने कोही नूर से प्रभावित होकर अपनी ऑटोबायोग्राफी बाबर नामा में इसकी खूब चर्चा की उसने कोहीनूर की तारीफ करते हुए लिखा कि यह हीरा इतना बेशकीमती है कि इसकी कीमत से पूरी दुनिया को एक दिन का खाना खिलाया जा सकता है हालांकि बाबर ने बाबर नामा में इस हीरे का नाम कहीं भी कोहिनूर मेंशन नहीं किया था जिससे यह साफ होता है कि इस हीरे का नाम उस समय तक कोहीनूर नहीं था बाबर के बाद हुमायूं मुगल डायनेस्टी का अगला राजा बना और सत्ता के साथ कोहीनूर भी उसके पास आ गया सत्ता मिलने के कुछ साल बाद ही हुमायूं का एंपायर बिखरने लगा उसके छोटे भाइयों ने ही उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया जिस कारण उसे अपना एंपायर अपने भाइयों के बीच बांटना पड़ा अपने भाइयों से निपटने के बाद उसने अपने एंपायर को यूनाइट करना स्टार्ट ही किया था कि उस पर अफगान शासक शेरशाह शूरी ने अटैक कर दिया दो सालों में दोनों के बीच चौसा और कन्नौज में दो बैटल लड़ी गई दोनों ही बार हुमायूं को मुखी खानी पड़ी और उसे अपना सब कुछ छोड़कर ईरान भागकर राजा तहस के यहां शरण लेनी पड़ी तह मास्काई कई सालों तक उसे अपने संरक्षण में रखा उनके इस व्यवहार से खुश होकर यू ने कोहीनूर उनको उपहार में सौंप दिया

इस तरह कोहीनूर पहली बार भारत से बाहर ईरान पहुंच गया ईरान के राजा तह मास के पास कोहिनूर लगभग 3 सालों तक रहा इसके बाद कोहिनूर एक बार फिर से भारत लौट आया जहां अब तक कई राजाओं ने कोहिनूर को हथियाने के लिए हजारों लाशें बिछा दी थी तो वही राजा तह मास की इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी इसलिए उन्होंने इसे अहमदनगर के राजा और अपने गहरे दोस्त निजाम शाह को गिफ्ट कर दिया जो कोहीनूर के दीवाने थे भारत आने के बाद कोहीनूर कुछ सालों तक निजाम शाह के पास रहा और फिर उनसे होते हुए गोलकुंडा के राजा कुतुब शाह के पास पहुंच गया साल 1656 में यह हीरा किसी तरह कुतुब शाह के प्रधानमंत्री मीर जुमला के हाथ लग गया जिसका इस्तेमाल उसने शाहजा के करीब जाने के लिए किया शाहजा को आकर्षक चीजों का बहुत शौक था इसी शौक के चलते उसने पीकॉक थ्रोन बनवाना शुरू किया कहा जाता है कि इस पीकॉक थ्रोन को बनवाने में शाहजहां ने ताजमहल से भी दोगुना खर्चा किया था उसने सिंहासन में कई तरह के डायमंड गोल्ड और बेशकीमती स्टोंस लगवाए और कोहीनूर को इस थ्रोन के सबसे ऊपरी हिस्से में जगाह दी लेकिन उस सिंहासन पर शाहजा ज्यादा वक्त तक नहीं बैठ पाया और आगे चलकर उसके ही बेटे औरंगजेब ने उसे अरेस्ट करवाकर जेल में डलवा दिया औरंगजेब ने अपने पिता की सत्ता हथियाने के साथ-साथ कोहीनूर को भी हड़प लिया औरंगजेब कोहीनूर को देखने के बाद इससे बहुत आकर्षित हुआ और उसने इसे और भी अट्रैक्टिव बनाने के लिए एक मशहूर जोहरी को इसे तराशने का काम सौंप दिया लेकिन तराशने के दौरान कोहीनूर का काफी हिस्सा टूट गया जिससे यह 793 कैरेट की जगह महज 186 कैरेट का रह गया औरंगजेब को जब इसकी खबर लगी तो वह बहुत गुस्सा हुआ और उसने उस जोहरी पर भारी भरकम जुर्माना लगाकर इसे अपने खजाने में रखवा दिया जहां कोहीनूर अपनी चमक के लिए मशहूर था तो वही इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि इस हीरे को जिसने भी अपने पास रखा उसने शुरुआत में हर जगह जीत का परचम लहराया लेकिन बीतते समय के साथ यह हीरा ही उसकी बर्बादी का कारण बना आने वाले सालों में लोगों ने इसे सच होते हुए भी देखा खोजे जाने के बाद से यह हीरा जिस भी राजा के पास गया उसका एंपायर बहुत तेजी के साथ बिखर कर बर्बाद हो गया मुगल बादशाह बाबर हुमायूं और शाहजा के पास कोहिनूर रहा था और उन्हें अपने शासन के अंत में सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ा जबकि हीरा कभी भी मुगल सम्राट अकबर के पास नहीं रहा और वह मुगलों में सबसे लोकप्रिय शासक रहे मुगलों के बिखरते साम्राज्य के बीच कोहीनूर इसी डायनेस्टी के राजा मोहम्मद शाह रंगीला के पास पहुंचा जिन्हें बहादुर शाह रंगीला के नाम से भी जाना जाता था

मुगल इस दौरान कमजोर पड़ चुके थे इसी का फायदा उठाते हुए ईरान के शासक नादिर शाह ने आक्रमण कर बहादुर शाह रंगीला के अंपायर को तहस-नहस कर दिया उसने पूरी दिल्ली में भयंकर कत्लेआम मचाया जो भी उसके रास्ते में आया वह अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठा चंद दिनों के अंदर ही नादिर शाह ने मुगलों की सारी संपत्ति लूट ली और शाहजा द्वारा बनवाया गया पीकॉक थ्रोन भी अपने कब्जे में ले लिया लेकिन अब तक उसे वो कोहीनूर नहीं मिला था जिसकी चमक के चर्चे उसने सुन रखे थे दरअसल कोही नूर उसके हाथ अभी तक इसलिए नहीं लगा था क्योंकि बहादुर शाह रंगीला उसे अपनी पगड़ी में छुपा कर रखता था नादिर शाह को जब इस बात की खबर लगी तो उसने इसे हासिल करने के लिए बहादुर शाह से अपनी जीत की खुशी मनाने के लिए एक दूसरे की पगड़ी पहनने को कहा बहादुर शाह जो पहले ही जंग हार चुके थे वो अब नादिर शाह की बात ना मानकर अपनी जिंदगी नहीं गवाना चाहते थे इसलिए उन्हें अपनी पगड़ी उतारने के लिए मजबूर होना पड़ा जैसे ही बहादुर शाह ने अपनी पगड़ी निकाली हीरा जमीन पर गिर पड़ा जमीन पर पर गिरते ही उसकी रोशनी चारों तरफ फैल गई इसे देखकर नादिर शाह चंबे में पड़ गया और उसके मुंह से कोहीनूर शब्द निकल पड़ा जिसका मतलब था माउंटेन ऑफ लाइट तब से ही यह हीरा कोहीनूर के नाम से जाना जाने लगा कुछ दिनों के बाद नादिर शाह भारत से कोहिनूर समेत बहुत सारी संपत्ति लूटकर अपनी सेना के साथ ईरान लौट आया वक्त गुजर जाने के बावजूद उसका कोहीनूर को लेकर आकर्षण कम नहीं हुआ वो कोहीनूर का इतना दीवाना था कि उसे हर वक्त अपनी नजरों के सामने रखना चाहता था इसलिए नादिर शाह ने कोहीनूर को अपनी आम पर बांधना शुरू कर दिया कुछ सालों तक तो सब ठीक चलता रहा लेकिन फिर कोहीनूर ने नादिर शाह के अंपायर पर भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया उसकी जिंदगी इस कदर बर्बाद हुई कि अंतिम समय में वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा और अपने ही लॉयल बॉडीगार्ड्स पर शक करने लगा इस शक के चलते उसने अपने सभी कमांडर्स को हटाकर उनकी जगह अहमद शाह दुर्रानी को कमांडर अपॉइंट्स और बॉडीगार्ड्स को खत्म

करने का आदेश दे दिया लेकिन नादिर शाह की प्लानिंग की खबर उसके पुराने बॉडीगार्ड्स को लग गई जिसके बाद सालार खान और मोहम्मद खान का जर नाम के दो बॉडीगार्ड्स ने उसी रात नादिर शाह की हत्या कर दी आगे चलकर नादिर शाह के फाइनेंशियल ऑफिसर मोहम्मद काजिम मारवी ने आलम अराय नादरी नाम से एक किताब लिखी जिसमें इस हीरे का नाम कोहीनूर मेंशन किया गया था जो इस हीरे का कोहीनूर नाम होने का फर्स्ट वैलिड सोर्स है नादिर शाह की मौत के बाद उसके एंपायर पर अहमद शाह दुरानी का कब्जा हो गया और वो कोहीनूर को ईरान से अफगानिस्तान ले गया इस तरह कोहीनूर भारत से ईरान और फिर अफगानिस्तान पहुंच गया इसके बाद अफगानिस्तान में ही अहमद शाह दुर्रानी के ही वंशज शाह सूजा दुर्रानी के पास कोहिनूर आ गया बदलते वक्त के साथ राज सिंहासन बदल जाते कोहिनूर पर मालिकाना हक रखने वाले राजा बदल जाते लेकिन एक चीज जो नहीं बदलती थी तो वो थी कोहिनूर की चमक और उसको लेकर लोगों का आकर्षण एक बार शाह सूजा की पत्नी वफा बेगम से किसी ने कोहीनूर की प्राइस प्रेडिक्शन करने का कहा बेगम ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अगर चार ताकतवर पहलवानों से चारों दिशाओं में एक-एक पत्थर फिवारे आकाश की ओर उछाल दिया जाए इसके बाद पांचों पत्थरों ने जितना डिस्टेंस तय किया उस डिस्टेंस को अगर गोल्ड से भर दिया जाए तो भी उस पूरे सोने की कीमत को ही नूर जितनी नहीं हो सकती बेगम की इस बात से कल्पना की जा सकती है कि आखिर कोहीनूर क्यों इतना प्राइसलेस और पॉपुलर था सत्ता और कोहीनूर को पाने के बाद शुरू शुरू में शाह शुजा दुर्रानी के शासनकाल में सब ठीक चल रहा था उसने आसपास पास के कई क्षेत्रों को जीत कर अपनी शक्ति बढ़ा ली थी


लेकिन एकाएक उसके परिवार में फूट पड़ गई और उसके भाइयों ने ही उसके खिलाफ विद्रोह करके उसे गद्दी से उतार फेंका शाह शूज दुर्रानी को अपनी पत्नी के साथ अफगानिस्तान से भागकर लाहौर आना पड़ा जहां राजा रणजीत सिंह ने उन्हें शरण दी महाराजा रणजीत सिंह ने ना केवल उसे लाहौर में रहने की इजाजत दी बल्कि उसे फिर से अपनी सत्ता हासिल करने के लिए मोटिवेट भी किया दोबारा सत्ता हासिल करने के क्रम में उसने अटक पर हमला किया लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा अटक के शासक जहान दद खान ने उसे अरेस्ट कर लिया और श्रीनगर की जेल में बंद कर दिया जैसे ही इसकी खबर महाराजा रणजीत सिंह को लगी उन्होंने अपने कमांडर महकम चंद को उसे छुड़वाने के लिए कश्मीर भेजा जिसके बाद महकम चंद उसे रिहा करवाकर लाहौर ले आए महाराजा रणजीत सिंह द्वारा अपने हस्बैंड की जान बचाने से वफा बेगम बहुत खुश हुई और उन्होंने कोहीनूर महाराजा रणजीत सिंह को गिफ्ट के तौर पर दे दिया महाराजा रणजीत सिंह सिख एंपायर के राजा थे

interesting histry hai
Yesa hai eska history mujhe pata nahi tha